Monday, October 15, 2018
सुनने की कला
Thursday, May 3, 2018
तेरा या तेराह
कुछ रुपए दे कर उन्हें भेजा। जाते वक्त कहा कि देख, लाभ का खयाल रखना क्योंकि लाभ के बिना धंधे में कोई अर्थ नहीं है। नानक ने कहा " ठीक, खयाल रखूंगा।"वे दूसरे दिन घर वापिस आ गए। खाली चले आ रहे थे और बड़े प्रसन्न थे। पिता ने पूछा " क्या हुआ, बड़ा प्रसन्न दिखायी पड़ता है! इत्ती जल्दी भी आ गया! और कुछ सामान इत्यादि कहां है? "
उन्होंने कहा "सामान छोड़ो , लाभ कमा लाया हूं। कंबल खरीद कर ला रहे थे, राह में साधु मिल गए। वे सब नंगे बैठे थे। सर्दी के दिन थे, सबको बांट दिए। आपने कहा था न कि लाभ. . .!'
पिता ने सिर ठोंक लिया होगा, कि इस लाभ के लिए थोड़े ही कहा था। कहां के लफंगों को, फिजूल के आदमियों को कंबल बांट आया! ऐसे कहीं धंधा होगा? लेकिन नानक ने कहा " आपने ही कहा था कि कुछ लाभ करके आना। अब मैंने देखा कि अगर कंबल लाकर बेचूंगा, दस-पचास रुपए का लाभ होगा; लेकिन इन परमात्मा के प्यारों को अगर बांट दिया तो बड़ा लाभ होगा।"
फिर नौकरी पर लगा दिया। गांव के सूबेदार के घर नौकरी लगा दी । सीधा सादा काम दिलवा दिया। काम था कि जो सिपाहियों को रोज भोजन दिया जाता था, वह उनको तौलकर दे देना। तो वह दिनभर तौलते रहते तराजू लेकर। एक दिन तौलतेत्तौलते समाधि लग गई। रस तो भीतर परमात्मा में लगा था। तौलते रहते थे, बैठे रहते थे दुकान पर, काम करवा रहे थे पिता तो करते थे; लेकिन भीतर तो याद परमात्मा की चल रही थी। उसी याद के कारण यह बड़ी क्रांतिकारी घटना घट गयी। एक दिन तौलतेत्तौलते संख्या आयी--सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह और तेरह--तो पंजाबी में "तेरह' तो नहीं है, "तेरा' है। तो "तेरा' शब्द उठते ही उसकी याद आ गयी। वह याद तो भीतर चल ही रही थी। उस याद से सूत्र जुड़ गया। "तेरा' यानी परमात्मा का। फिर तो मस्त हो गए, फिर तो मगन हो गए। फिर तो "तेरा' से आगे बढ़े ही नहीं। फिर तो तौलते ही गए। जो आया, उसको ही तौलते गए--"तेरा' और "तेरा'! खबर पहुंच गयी सूबेदार के पास कि इसका दिमाग खराब हो गया है। वे "तेरा' ही पर अटका है, और सभी को तौलता जा रहा है;जितना जिसको जो ले जा रहा है, ले जा रहा है! दुकान लुटवा देगा। पकड़कर बुलवाया गया। वह बड़े मस्त थे। उनकी आंखों में बड़ी ज्योति थी। पूछाः "यह तुम क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा " आखिरी संख्या आ गयी, अब इसके आगे संख्या ही क्या? "तेरा' के आगे अब और जाने को जगह कहां है? बाकी तो मेरे का फैलाव है। "तेरे' की बात आ गयी, खत्म हो गया मेरे का फैलाव; अब मुझे क्षमा करो, मुझे जाने दो। आज जो मजा पाया है तेरा कह कर,अब उसको चूकना नहीं चाहता। अब तो चौबीस घंटे तेरा ही तेरा करूंगा। उसका ही सब है। वही है। आज "मेरा-मेरा'गया। आज तो तेरा ही हो गया।
Monday, February 26, 2018
उत्तराधिकारी
Monday, January 29, 2018
श्रद्धा
एक बार गुरुजी सत्संग करके आ रहे थे।रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ। उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा-“महापुरुषों, हमे चाय पीनी है।” ड्राइवर गाड़ी 5 स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरुजी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।” फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरूजी ने वह भी मना कर दिया।काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई। गुरूजी ने कहा- “यहाँ रोक दो। यहाँ पर पीते हैं चाय।” ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरुजी ऐसी जगह चाय पीएंगे। खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।”
जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरूजी का सरूप फोटो लगा हुआ था।गुरूजी का सरूप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”तो दुकानदार ने कहा-
“मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया।पर मुझे यकीन है कि गुरूजी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”तो ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”तो दुकानदार ने बोला-“अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।” तो ड्राइवर ने कहा-“चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”*
दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया।
जब वहां उसने गुरुजी के देखा तो हैरान हो गया।
आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा-“तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
Friday, January 12, 2018
मौजूदगी
एक युवक तो भागा, जल्दी बाहर गया, बगल की गली में पहुंचा, वहां कोई भी नहीं था | उसने जल्दी से गर्दन मरोड़ दी, लौट कर आ गया | उसने कहा, लो गुरुदेव | दीक्षा दो | गुरु ने कहा कि रुक |
दूसरा युवक कोई तीन महीने तक न लौटा | और पहला युवक बड़ा परेशान होने लगा कि हद हो गयी | अभी तक इसको ऐसी जगह न मिली जहां यह मार लेता, जहां कोई देखने वाला न हो | और बगल की गली काफी है |मैं उसमें मार कर आया हूँ | गुरु कहता, तो चुप रह ! और जब तक दूसरा न लौट आएगा तब तक मैं तुझे कुछ उत्तर न दूंगा | उसको आने दे |अब तो दूसरा आता ही नहीं | पहला घबड़ाने लगा | उसने कहा मुझे तो दीक्षा दे दें |
तीन महीने बाद दूसरा युवक लौटा कबूतर को साथ लेकर | हाल बेहाल था | शरीर सूख गया था लेकिन आँखों में एक अपूर्व ज्योति थी | गुरु के चरणों में सिर रख कर उसने कबूतर लौटा दिया कि यह नहीं हो सकता | आपने भी कहाँ की उलझन दे दी ! तीन महीने परेशान हो गया | सब जगह खोजा | ऐसी कोई जगह न मिली जहाँ कोई देखने वाला न हो |
फिर मैं अँधेरे तलघरे में चला गया | वहां कोई भी न था | ताला लगा दिया | रौशनी की एक किरण न पहुँचती थी, देखने का कोई सवाल ही नहीं था | लेकिन यह कबूतर रहा था | इसकी टुकुर टुकुर आँखें, इसके ह्रदय की धड़कन ! मैंने कहा, यह तो मौजूद है | तो फिर मैंने इसे ऐसा बंद किया डब्बों में कि इसकी धड़कन न सुनाई पड़े, न इसकी आँख दिखाई पड़ें | फिर इसे लेकर मैं गया, लेकिन तब भी हार हो गयी क्योंकि मैं मौजूद था | आपने कहा था, कोई भी मौजूद न हो | यह भी क्या शर्त लगा दी ? मेरी मौजूदगी तो रहेगी ही, अब मैं इसको कहीं भी ले जाऊं | मैं हार गया | अब मैं ले आया | आप चाहे दीक्षा, चाहे न दें ! लेकिन इस परीक्षा में ही मुझे बहुत कुछ मिल गया है | एक बात मेरी समझ में आ गयी कि एकमात्र ऐसी मौजूदगी है जो कभी भी नहीं खोयेगी, वह मेरी है | गुरु ने कहा, तू दीक्षित कर लिया गया |
Friday, December 15, 2017
सेवा का मोल
Thursday, December 14, 2017
स्वीकारता
Tuesday, November 21, 2017
प्रारब्ध
Monday, November 20, 2017
श्रद्धा
Sunday, November 19, 2017
शिष्य और शिष्यत्व
उन दोनों शिष्यों में से एक गुरु को भगवान मानता था। उसने तो गुरु के दिए हुए एक मुट्ठी गेहूं की पोटली बांध कर एक आलिए में सुरक्षित रख दिए और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरा शिष्य जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था, उसने उन एक मुट्ठी गेहूं को ले जाकर गुरुकुल के पीछे खेत में बो दिए।
कुछ महीनों बाद गुरु वापस आश्रम आए। उन्होंने अपने शिष्य जो उन्हें भगवान मानता था, उससे अपने एक मुट्ठी गेहूं वापस मांगे। उस शिष्य ने गुरु को ले जाकर आलिए में रखी गेहूं की पोटली दिखाई, जिसकी वह रोज पूजा करता था। गुरु ने देखा कि उस पोटली के गेहूं सड़ चुके हैं और अब वे किसी काम के नहीं रहे।फिर गुरु ने दूसरे शिष्य को जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था, उससे अपने गेहूं दिखाने के लिए कहा। दूसरे शिष्य ने गुरु को आश्रम के पीछे ले जाकर कहा - गुरुदेव! यह लहलहाती जो फसल देख रहे हैं यही आपके एक मुट्ठी गेहूं हैं। आप मुझे क्षमा करें कि जो गेहूं आप दे गए थे, वही गेहूं मैं वापस दे नहीं सकता।गुरु उसके द्वारा बोए गए गेहूं की लहलहाती फसल देखकर प्रसन्न चित्त हो गए। उन्होंने कहा- जो शिष्य गुरु के ज्ञान को फैलाता है, बांटता है, वही गुरु का श्रेष्ठ उत्तराधिकारी होने का पात्र है। वास्तव में गुरु के प्रति सच्ची दक्षिणा यही है।
गुरु ने कहा - गुरुदक्षिणा का सामान्य अर्थ में पारितोषिक के रूप में लिया जाता है, किंतु गुरुदक्षिणा का वास्तविक अर्थ कहीं ज्यादा व्यापक है। महज पारितोषिक नहीं। गुरुदक्षिणा का अर्थ है कि गुरु से प्राप्त की गई शिक्षा एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार व उसका सही उपयोग कर जनकल्याण में लगाएं। गुरु ने अपने दूसरे शिष्य से प्रभावित होकर उसे आश्रम का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया।
इस कहानी का तात्पर्य यह है कि जैसे सूर्य बिना कहे सबको प्राण ऊर्जा देता है, मेघ जल बरसाता है, हवा भी बिना किसी भेदभाव व लालच के ठंडक पहुंचा कर सभी को जीवित रखती है और फूल भी अपनी महक में कोई कसर नहीं रखता, वैसे ही गुरुजन भी स्वयं ही शिष्यों की भलाई में लगे रहते हैं।
Friday, November 17, 2017
शिष्य का गुरु
बड़ी जिज्ञासा जगी अकबर को। अकबर ने कहा तो फिर उन्हें बुलाओ! तानसेन ने कहा " इसीलिए कभी मैंने उनकी बात नही छेड़ी। आप मेरी सदा प्रशंसा करते थे, मैं चुपचाप पी लेता था, जैसे जहर का घूंट कोई पीता है, क्योंकि मेरे गुरु अभी जिन्दा हैं, उनके सामने मेरी क्या प्रशंसा! यह यूं ही है जैसे कोई सूरज को दीपक दिखाये। मगर मैं चुपचाप रह जाता था, कुछ कहता न था, आज न रोक सका अपने को, बात निकल गयी। लेकिन नहीं कहता था इसीलिए कि आप तत्क्षण कहेंगे, ‘उन्हें बुलाओ’। और तब मैं मुश्किल में पढूंगा, क्योंकि वे यूं आते नहीं। उनकी मौज हो तो जंगल में बजाते हैं, जहां कोई सुननेवाला नहीं। "तो अकबर ने कहा, फिर क्या करना पड़े, कैसे सुनना पड़े? तो तानसेन ने कहा, "एक ही उपाय है कि यह मैं जानता हूं कि रात तीन बजे वे उठते हैं, यमुना के तट पर आगरा में रहते हैं—हरिदास उनका नाम था—हम रात चलकर छुप जाएं—दो बजे रात चलना होगा; क्योंकि कभी तीन बजे बजाए, चार बजे —बजाए, पांच बजे बजाए; मगर एक बार जरूर सुबह—सुबह स्नान के बाद वे वीणा बजाते हैं— तो हमें चोरी से ही सुनना होगा, बाहर झोपड़े के छिपे रहकर सुनना होगा। " शायद ही दुनिया के इतिहास में किसी सम्राट ने, अकबर जैसे बड़े सम्राट ने चोरी से किसी की वीणा सुनी हो !!.लेकिन अकबर गया।
दोनों छिपे रहे एक झाड़ की ओट में, पास ही झोपड़े के पीछे। कोई तीन बजे स्नान करके हरिदास यमुना सै आये और उन्होंने अपनी वीणा उठायी और बजायी। कोई घंटा कब बीत गया—यूं जैसे पल बीत जाए! वीणा तो बंद हो गयी, लेकिन जो राग भीतर अकबर के जम गया था वह जमा ही रहा। आधा घंटे बाद तानसेन ने उन्हें हिलाया और कहा कि अब सुबह होने के करीब है, हम चलें! अब कब तक बैठे रहेंगे। अब तो वीणा बंद भी हो चुकी। अकबर ने कहा, बाहर की तो वीणा बंद हो गयी मगर भीतर की वीणा बजी ही चली जाती है। तुम्हें मैंने बहुत बार सुना, तुम जब बंद करते हो तभी बंद हो जाती है। यह पहला मौका है कि जैसे मेरे भीतर के तार छिड़ गये हैं।। और आज सच में ही मैं तुमसे कहता हूं कि तुम ठीक ही कहते थे कि कहा तुम और कहां तुम्हारे गुरु!!
अकबर की आंखों से आंसू झरे जा रहे हैं। उसने कहा, मैंने बहुत संगीत सुना, इतना भेद क्यों है? और तेरे संगीत में और तेरे गुरु के संगीत में इतना भेद क्यों है? जमीन— आसमान का फर्क है। तानसेन ने कहा, "कुछ बात कठिन नहीं है। मैं बजाता हूं कुछ पाने के लिए; और वे बजाते हैं क्योंकि उन्होंने कुछ पा लिया है। उनका बजाना किसी उपलब्धि की, किसी अनुभूति की अभिव्यक्ति है। मेरा बजाना तकनीकी है। मैं बजाना जानता हूं मैं बजाने का पूरा गणित जानता हूं मगर गणित!!! बजाने का अध्यात्म मेरे पास नहीं! और मैं जब बजाता होता हूं तब भी इस आशा में कि आज क्या आप देंगे? हीरे का हार भेंट करेंगे, कि मोतियों की माला, कि मेरी झोली सोने से भर देंगे, कि अशार्फेयों से? जब बजाता हूं तब पूरी नजर भविष्य पर अटकी रहती है, फल पर लगी रहती है। वे बजा रहे हैं, न कोई फल है, न कोई भविष्य, वर्तमान का क्षण ही सब कुछ है। उनका बजाना आनंद है, साधन नहीं। वे मस्ती में हैं।