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Monday, October 15, 2018

सुनने की कला

महावीर के पास एक युवक आया है। और वह जानना चाहता है कि सत्य क्या है। तो महावीर कहते हैं कि कुछ दिन मेरे पास रह। और इसके पहले कि मैं तुझे कहूं, तेरा मुझसे जुड़ जाना जरूरी है। एक वर्ष बीत गया है और उस युवक ने फिर पुन: पूछा है कि वह सत्य आप कब कहेंगे? महावीर ने कहा कि मैं उसे कहने की निरंतर चेष्टा कर रहा हूं लेकिन मेरे और तेरे बीच कोई सेतु नहीं है .  तू अपने प्रश्न को भी भूल और अपने को भी भूल। तू मुझसे जुड्ने की कोशिश कर। और ध्यान रख, जिस दिन तू जुड़ जाएगा, उस दिन तुझे पूछना नहीं पड़ेगा कि सत्य क्या है? मैं तुझसे कह दूंगा। फिर अनेक वर्ष बीत गए। वह युवक रूपांतरित हो गया। उसके जीवन में और ही जगत की सुगंध आ गई। कोई और ही फूल उसकी आत्मा में खिल गए। एक दिन महावीर ने उससे पूछा कि तूने सत्य के संबंध में पूछना अनेक वर्षों से छोड़ दिया? उस युवक ने कहा, पूछने की जरूरत न रही। जब मैं जुड़ गया, तो मैंने सुन लिया। तो महावीर ने अपने और शिष्यों से कहा कि एक वक्त था, यह पूछता था, और मैं न कह पाया। और अब एक ऐसा वक्त आया कि मैंने इससे कहा नहीं है और इसने सुन लिया!

Thursday, May 3, 2018

तेरा या तेराह

एक समय की बात है . नानक को उनके पिता ने, बड़ी कोशिशें कीं--कुछ काम में लग जाए, कुछ धंधा कर ले। स्वभावतः प्रत्येक पिता चाहता है कि बेटा कुछ करे, कमाए। किसी ने सलाह दी कि इसको कुछ रुपए दे दो, खरीदने भेजो; कुछ सामान खरीद लाए, कुछ बेच लाए, ले जाए, व्यापार करे। कुछ लगेगा काम में तो ठीक, नहीं तो यह खराब हो जाएगा। यह धीरे-धीरे साधुओं के सत्संग में खराब हुआ जा रहा है।

कुछ रुपए दे कर उन्हें भेजा। जाते वक्त कहा कि देख, लाभ का खयाल रखना क्योंकि लाभ के बिना धंधे में कोई अर्थ नहीं है। नानक ने कहा " ठीक, खयाल रखूंगा।"वे दूसरे दिन घर वापिस आ गए। खाली चले आ रहे थे और बड़े प्रसन्न थे। पिता ने पूछा " क्या हुआ, बड़ा प्रसन्न दिखायी पड़ता है! इत्ती जल्दी भी आ गया! और कुछ सामान इत्यादि कहां है? "

उन्होंने कहा  "सामान छोड़ो , लाभ कमा लाया हूं। कंबल खरीद कर ला रहे थे, राह में साधु मिल गए। वे सब नंगे बैठे थे। सर्दी के दिन थे, सबको बांट दिए। आपने कहा था न कि लाभ. . .!'

पिता ने सिर ठोंक लिया होगा, कि इस लाभ के लिए थोड़े ही कहा था। कहां के लफंगों को, फिजूल के आदमियों को कंबल बांट आया! ऐसे कहीं धंधा होगा? लेकिन नानक ने कहा " आपने ही कहा था कि कुछ लाभ करके आना। अब मैंने देखा कि अगर कंबल लाकर बेचूंगा, दस-पचास रुपए का लाभ होगा; लेकिन इन परमात्मा के प्यारों को अगर बांट दिया तो बड़ा लाभ होगा।"

फिर नौकरी पर लगा दिया। गांव के सूबेदार के घर नौकरी लगा दी । सीधा सादा काम दिलवा दिया। काम था कि जो सिपाहियों को रोज भोजन दिया जाता था, वह उनको तौलकर दे देना। तो वह दिनभर तौलते रहते तराजू लेकर। एक दिन तौलतेत्तौलते समाधि लग गई। रस तो भीतर परमात्मा में लगा था। तौलते रहते थे, बैठे रहते थे दुकान पर, काम करवा रहे थे पिता तो करते थे; लेकिन भीतर तो याद परमात्मा की चल रही थी। उसी याद के कारण यह बड़ी क्रांतिकारी घटना घट गयी। एक दिन तौलतेत्तौलते संख्या आयी--सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह और तेरह--तो पंजाबी में "तेरह' तो नहीं है, "तेरा' है। तो "तेरा' शब्द उठते ही उसकी याद आ गयी। वह याद तो भीतर चल ही रही थी। उस याद से सूत्र जुड़ गया। "तेरा' यानी परमात्मा का। फिर तो मस्त हो गए, फिर तो मगन हो गए। फिर तो "तेरा' से आगे बढ़े ही नहीं। फिर तो तौलते ही गए। जो आया, उसको ही तौलते गए--"तेरा' और "तेरा'! खबर पहुंच गयी सूबेदार के पास कि इसका दिमाग खराब हो गया है। वे "तेरा' ही पर अटका है, और सभी को तौलता जा रहा है;जितना जिसको जो ले जा रहा है, ले जा रहा है! दुकान लुटवा देगा। पकड़कर बुलवाया गया। वह बड़े मस्त थे। उनकी आंखों में बड़ी ज्योति थी। पूछाः "यह तुम क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा " आखिरी संख्या आ गयी, अब इसके आगे संख्या ही क्या? "तेरा' के आगे अब और जाने को जगह कहां है? बाकी तो मेरे का फैलाव है। "तेरे' की बात आ गयी, खत्म हो गया मेरे का फैलाव; अब मुझे क्षमा करो, मुझे जाने दो। आज जो मजा पाया है तेरा कह कर,अब उसको चूकना नहीं चाहता। अब तो चौबीस घंटे तेरा ही तेरा करूंगा। उसका ही सब है। वही है। आज "मेरा-मेरा'गया। आज तो तेरा ही हो गया।

Monday, February 26, 2018

उत्तराधिकारी

एक समय की बात है .  एक बहुत बड़ा फकीर हुआ। वह अपने गुरु के पास गया तो गुरु ने उससे पूछा कि तू सच में संन्यासी हो जाना चाहता है कि संन्यासी दिखना चाहता है? उसने कहा कि जब संन्यासी ही होने आया तो दिखने का क्या करूंगा? होना चाहता हूं। तो गुरु ने कहा, फिर ऐसा कर, यह अपनी आखिरी मुलाकात हुई। पाँच सौ संन्यासी हैं इस आश्रम में तू उनका चावल कूटने का काम कर। अब दुबारा यहां मत आना। जरूरत जब होगी, मैं आ जाऊंगा।   बारह साल बीत गए। वह संन्यासी चौके के पीछे, अंधेरे गृह में चावल कूटता रहा। पांच सौ संन्यासी थे। सुबह से उठता, चावल कूटता रहता। रात थक जाता, सो जाता। बारह साल बीत गए। वह कभी गुरु के पास दुबारा नहीं गया। क्योंकि जब गुरु ने कह दिया, तो बात खतम हो गयी। जब जरूरत होगी वे आ जाएंगे, भरोसा कर लिया।
कुछ दिनों तक तो पुराने खयाल चलते रहे, लेकिन अब चावल ही कूटना हो दिन—रात तो पुराने खयालों को चलाने से फायदा भी क्या? धीरे—धीरे पुराने खयाल विदा हो गए। उनकी पुनरुक्ति में कोई अर्थ न रहा। खाली हो गए, जीर्ण—शीर्ण हो गए। बारह साल बीतते—बीतते तो उसके सारे विदा ही हो गए विचार। चावल ही कूटता रहता। शांत रात सो जाता, सुबह उठ आता, चावल कूटता रहता। न कोई अड़चन, न कोई उलझन। सीधा—सादा काम, विश्राम। बारह साल बीतने पर गुरु ने घोषणा की कि मेरे जाने का वक्त आ गया और जो व्यक्ति भी उत्तराधिकारी होना चाहता हो मेरा, रात मेरे दरवाजे पर चार पंक्तियां लिख जाए जिनसे उसके सत्य का अनुभव हो। लोग बहुत डरे, क्योंकि गुरु को धोखा देना आसान न था। शास्त्र तो बहुतों ने पढ़े थे। फिर जो सब से बडा पंडित था, वही रात लिख गया आकर। उसने लिखा कि मन एक दर्पण की तरह है, जिस पर धूल जम जाती है। धूल को साफ कर दो, धर्म उपलब्ध हो जाता है। धूल को साफ कर दो, सत्य अनुभव में आ जाता है। सुबह गुरु उठा, उसने कहा, यह किस नासमझ ने मेरी दीवाल खराब की? उसे पकड़ो।
वह पंडित तो रात ही भाग गया था, क्योंकि वह भी खुद डरा था कि धोखा दें! यह बात तो बढ़िया कही थी उसने, पर शास्त्र से निकाली थी। यह कुछ अपनी न थी। यह कोई अपना अनुभव न था।    वह रात ही भाग गया था कि कहीं अगर सुबह गुरु ने कहा, ठीक! तो मित्रों को कह गया था, खबर कर देना; अगर गुरु कहे कि पकड़ो, तो मेरी खबर मत देना। सारा आश्रम चिंतित हुआ। इतने सुंदर वचन थे। वचनों में क्या कमी है? मन दर्पण की तरह है, शब्दों की, विचारों की, अनुभवों की धूल जम जाती है। बस इतनी ही तो बात है। साफ कर दो दर्पण, सत्य का प्रतिबिंब फिर बन जाता है। लोगों ने कहा, यह तो बात बिलकुल ठीक है, गुरु जरा जरूरत से ज्यादा कठोर है। पर अब देखें, इससे ऊंची बात कहां से गुरु ले आएंगे। ऐसी बात चलती थी, चार संन्यासी बात करते उस चावल कूटने वाले आदमी के पास से निकले। वह भी सुनने लगा उनकी बात। सारा आश्रम गर्म! इसी एक बात से गर्म था।
सुनी उनकी बात, वह हंसने लगा। उनमें से एक ने कहा, तुम हंसते हो! बात क्या है? उसने कहा, गुरु ठीक ही कहते हैं। यह किस नासमझ ने लिखा? वे चारों चौंके। उन्होंने कहा, तू बारह साल से चावल ही कूटता रहा, तू भी इतनी हो गया! हम शास्त्रों से सिर ठोंक—ठोंककर मर गए। तो तू लिख सकता है इससे बेहतर कोई वचन? उसने कहा, लिखना तो मैं भूल गया, बोल सकता हूं अगर कोई लिख दे जाकर। लेकिन एक बात खयाल रहे, उत्तराधिकारी होने की मेरी कोई आकांक्षा नहीं। यह शर्त बता देना कि वचन तो मै बोल देता हूं अगर कोई लिख भी दे जाकर—मैं तो लिखूंगा नहीं, क्योंकि मैं भूल गया, बारह साल हो गए कुछ लिखा नहीं—उत्तराधिकारी मुझे होना नहीं है। अगर इस लिखने की वजह से उत्तराधिकारी होना पड़े, तो मैंने कान पकड़े, मुझे लिखवाना भी नहीं। पर उन्होंने कहा, बोल! हम लिख देते है जाकर। उसने लिखवाया कि लिख दो जाकर—कैसा दर्पण? कैसी धूल? न कोई दर्पण है, न कोई धूल है, जो इसे जान लेता है, धर्म को उपलब्ध हो जाता है।
आधी रात गुरु उसके पास आया और उसने कहा कि अब तू यहां से भाग जा। अन्यथा ये पांच सौ तुझे मार डालेंगे। यह मेरा चोगा ले, तू मेरा उत्तराधिकारी बनना चाहे या न बनना चाहे, इससे कोई सवाल नही, तू मेरा उत्तराधिकारी है। मगर अब तू यहां से भाग जा। अन्यथा ये बर्दाश्त न करेंगे कि चावल कूटने वाला और सत्य को उपलब्ध हो गया, और ये सिर कूट—कूटकर मर गए।

Monday, January 29, 2018

श्रद्धा

एक बार गुरुजी सत्संग करके आ रहे थे।रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ। उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा-“महापुरुषों, हमे चाय पीनी है।” ड्राइवर गाड़ी 5 स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरुजी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।” फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरूजी ने वह भी मना कर दिया।काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई। गुरूजी ने कहा- “यहाँ रोक दो। यहाँ पर पीते हैं चाय।” ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरुजी ऐसी जगह चाय पीएंगे। खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।”

जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरूजी का सरूप फोटो लगा हुआ था।गुरूजी का सरूप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”तो दुकानदार ने कहा-
“मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया।पर मुझे यकीन है कि गुरूजी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”तो ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”तो दुकानदार ने बोला-“अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।” तो ड्राइवर ने कहा-“चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”*

दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया।

जब वहां उसने गुरुजी के देखा तो हैरान हो गया।

आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा-“तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

Friday, January 12, 2018

मौजूदगी

एक गुरु के पास दो युवक आये और उन्होंने दीक्षित होने की प्रार्थना की | गुरु ने कहा कि इससे पहले कि तुम्हें दीक्षित करूँ, एक परीक्षा | यह लो -- एक कबूतर तो ले, एक कबूतर तू ले -- और दोनों जाओ और ऐसी जगह मार कर कबूतर को जाओ, जहाँ कोई देखने वाला न हो |

एक युवक तो भागा, जल्दी बाहर गया, बगल की गली में पहुंचा, वहां कोई भी नहीं था | उसने जल्दी से गर्दन मरोड़ दी, लौट कर आ गया | उसने कहा, लो गुरुदेव | दीक्षा दो | गुरु ने कहा कि रुक |

दूसरा युवक कोई तीन महीने तक न लौटा | और पहला युवक बड़ा परेशान होने लगा कि हद हो गयी | अभी तक इसको ऐसी जगह न मिली जहां यह मार लेता, जहां कोई देखने वाला न हो | और बगल की गली काफी है |मैं उसमें मार कर आया हूँ | गुरु कहता, तो चुप रह ! और जब तक दूसरा न लौट आएगा तब तक मैं तुझे कुछ उत्तर न दूंगा | उसको आने दे |अब तो दूसरा आता ही नहीं | पहला घबड़ाने लगा | उसने कहा मुझे तो दीक्षा दे दें |

तीन महीने बाद दूसरा युवक लौटा कबूतर को साथ लेकर | हाल बेहाल था | शरीर सूख गया था लेकिन आँखों में एक अपूर्व ज्योति थी | गुरु के चरणों में सिर रख कर उसने कबूतर लौटा दिया कि यह नहीं हो सकता | आपने भी कहाँ की उलझन दे दी ! तीन महीने परेशान हो गया | सब जगह खोजा | ऐसी कोई जगह न मिली जहाँ कोई देखने वाला न हो |

फिर मैं अँधेरे तलघरे में चला गया | वहां कोई भी न था | ताला लगा दिया | रौशनी की एक किरण न पहुँचती थी, देखने का कोई सवाल ही नहीं था | लेकिन यह कबूतर रहा था | इसकी टुकुर टुकुर आँखें, इसके ह्रदय की धड़कन ! मैंने कहा, यह तो मौजूद है | तो फिर मैंने इसे ऐसा बंद किया डब्बों में कि इसकी धड़कन न सुनाई पड़े, न इसकी आँख दिखाई पड़ें | फिर इसे लेकर मैं गया, लेकिन तब भी हार हो गयी क्योंकि मैं मौजूद था | आपने कहा था, कोई भी मौजूद न हो | यह भी क्या शर्त लगा दी ? मेरी मौजूदगी तो रहेगी ही, अब मैं इसको कहीं भी ले जाऊं | मैं हार गया | अब मैं ले आया | आप चाहे दीक्षा, चाहे न दें ! लेकिन इस परीक्षा में ही मुझे बहुत कुछ मिल गया है | एक बात मेरी समझ में आ गयी कि एकमात्र ऐसी मौजूदगी है जो कभी भी नहीं खोयेगी, वह मेरी है | गुरु ने कहा, तू दीक्षित कर लिया गया |

Friday, December 15, 2017

सेवा का मोल

 एक समय की बात है. एक गरीब आदमी था। वो हर रोज अपने गुरु के आश्रम जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने गुरु से कहता कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए। एक दिन गुरु ने पूछ ही लिया कि क्या तुम आश्रम में इसीलिए काम करने आते हो। उसने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दरशन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे। गुरु ने कहा कि तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा। युवक चला गया। समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि आश्रम में जाना ही छूट गया।  कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही आश्रम पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा। गुरु ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा--क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो। वो व्यक्ति बोला--बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका। गुरुजी, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया। गुरु ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था?  जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना।  फिर आज यहां क्या करने आए हो ? उसकी आंखों में आंसू भर आए, गुरु के चरणों में गिर पड़ा और बोला --अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए। गुरु ने कहा--पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए आश्रम की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे। गुरु ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है। वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर  गुरु को देखता रहा और बोला--मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए। सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है।।

Thursday, December 14, 2017

स्वीकारता

 एक समय की बात है..एक दिन गुरु नानकदेव अकेले बैठे हुए थे। एक डाकू उनके पास आया और उनके चरणों में गिरकर कहने लगा- 'मैं डाकू हूँ, अपने जीवन से परेशान हूँ, अपने को सुधारना चाहता हूँ। इन पापों से, जो मैं रोज करता हूँ, मुक्ति चाहता हूँ। मुझे कोई उपाय बताइये। मेरा मार्गदर्शन कीजिये।' नानकदेव पहले तो उस डाकू के हाव-भाव देखते रहे, फिर बोले- 'तुम आज से डाका डालना और झूठ बोलना छोड दो, सब ठीक हो जायेगा।' डाकू उन्हें प्रणाम करके लौट गया। लेकिन कुछ दिन के बाद फिर आया और कहने लगा-'मैंने झूठ न बोलने और डाका न डालने की भरसक कोशिश की मगर इन आदतों को छोड़ नहीं पाता। लेकिन मैं सुधरना अवश्य चाहता हूँ। आप मुझे कोई उपाय बताइये।' और वह उनके चरणों में गिर पड़ा। गुरुजी पुन: सोच में पड़ गये फिर उनके होठों पर मुस्कान आयी। वे डाकू से बोले- 'अच्छा, जो तुम्हारे मन में आये करो लेकिन दिनभर झूठ बोलने, डाका डालने के बाद प्रतिदिन लोगों के सामने अपने इन सब कामों का बखान कर दो।' डाकू को यह उपाय बहुत आसान मालूम हुआ। वह प्रणाम करके चला गया। इस बार बहुत दिन बीत गये डाकू लौटकर नहीं आया। फिर एक दिन जब गुरुजी ध्यानमग्न थे, अचानक वह उनके सामने आ खड़ा हुआ। गुरुजी ने जब उसे पास खड़े देखा, तो पूछा-'बहुत दिनों के बाद लौटे हो।' डाकू बोला- 'मैं आपके बताये उस उपाय को बहुत आसान समझता था, लेकिन वह तो बहुत कठिन निकला। लोगों के सामने अपनी बुराइयां कहने में तो लाज आती है, सो मैंने बुरे काम करना ही छोड़ दिया है।'   ज़िन्दगी में बुरे अथवा गलत काम करना जितना आसान होता है उससे कही ज्यादा मुश्किल उन्हें स्वीकार करते हुए जीने में होता है।

Tuesday, November 21, 2017

प्रारब्ध

एक समय की बात है.एक गुरूजी थे । हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करते थे । काफी बुजुर्ग हो गये थे । उनके कुछ शिष्य साथ मे ही पास के कमरे मे रहते थे । जब भी गुरूजी को शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वे अपने शिष्यो को आवाज लगाते थे और शिष्य ले जाते थे । धीरे धीरे कुछ दिन बाद शिष्य दो तीन बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आते कभी और भी देर से आते ।  एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही गुरूजी आवाज लगाते है, तुरन्त एक बालक आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ गुरूजी को निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।  एक दिन गुरूजी को शक हो जाता है कि, पहले तो शिष्यों को तीन चार बार आवाज लगाने पर भी देर से आते थे । लेकिन ये बालक तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है । एक दिन गुरूजी उस बालक का हाथ पकड लेते है और पूछते कि सच बता तू कौन है ? मेरे शिष्य तो ऐसे नही हैं । वो बालक के रूप में स्वयं ईश्वर थे; उन्होंने गुरूजी को स्वयं का वास्तविक रूप दिखाया। गुरूजी रोते हुये कहते है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना । प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।गुरूजी कहते है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ।प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।


Monday, November 20, 2017

श्रद्धा

 एक समय की बात है. एक शिष्य अपने गुरु के आश्रम में कई वर्षों तक रहा। उसने उनसे शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। एक दिन उसने देखा कि उसके गुरु पानी पर चले आ रहे हैं। यह देखकर उसे बहुत हैरानी हुई। जब गुरु पास में आए तो वह उनके पैरों पर गिरकर बोला, 'आप तो बड़े चमत्कारी हैं।यह रहस्य आपने अब तक क्यों छिपाए रखा?कृपया मुझे भी यह सूत्र बताइए कि पानी पर किस प्रकार चला जाता है,अन्यथा मैं आप के पैर नहीं छोडूंगा?' गुरु ने कहा, 'उसमें कोई रहस्य नहीं है। बस भरोसा करने की बात है। श्रद्धा चाहिए। श्रद्धा हो तो सब कुछ संभव है।इसके लिए उसका नाम स्मरण ही पर्याप्त है जिसके प्रति तुम भक्ति रखते हो। 'वह शिष्य अपने गुरु का नाम रटने लगा।अनेक बार नाम जपने के बाद उसने पानी पर चलने की बात सोची पर जैसे ही पानी में उतरा डुबकी खा गया। मुंह में पानी भर गया। बड़ी मुश्किल से बाहर आया। बाहर आकर वह बड़ा क्रोधित हुआ। गुरु के पास जाकर बोला, 'आपने तो मुझे धोखा  या। मैंने कितनी ही बार आप का नाम जपा, फिर भी डुबकी खा गया। यों मैं तैरना भी जानता हूं। मगर मैंने सोचा कि बहुत जप लिया नाम। अब तो पूरी हो गई होगी श्रद्धा वाली शर्त और जैसे ही पानी पर उतरा डूबने लगा। सारे कपड़े खराब हो गए। कुछ बात जंची नहीं। ' गुरु ने कहा, 'कितनी बार नाम का जाप किया?' शिष्य ने कहा, ' हजार से भी ऊपर। किनारे पर खड़े- खड़े भी किया। पानी पर उतरते समय भी और डूबते-डूबते भी करता रहा। ' गुरु ने कहा, 'बस तुम्हारे डूबने का यही कारण है। मन में सच्ची श्रद्धा होती तो बस एक बार का जाप ही पर्याप्त था। बस एक बार नाम ले लेते तो बात बन जाती।  सच्ची श्रद्धा गिनती नहीं अपने ईष्ट के प्रति समर्पण मांगती है।


Sunday, November 19, 2017

शिष्य और शिष्यत्व

एक समय की बात है। एक गुरु अपने आश्रम को लेकर बहुत चिंतित थे, क्योंकि गुरु वृद्ध हो चले थे लेकिन उन्हें यह चिंता सताए जा रही थी कि मेरी जगह कौन योग्य उत्तराधिकारी हो, जो आश्रम को ठीक तरह से संचालित कर सके. उनके आश्रम में दो योग्य शिष्य थे और दोनों ही गुरु को बहुत प्रिय थे। एक दिन गुरु ने उनको बुलाया और कहा - मेरे प्यारे शिष्यों, मैं तीर्थ पर जा रहा हूं और तुमसे गुरुदक्षिणा के रूप में बस इतना ही मांगता हूं कि यह दो मुट्ठी गेहूं है। एक-एक मुट्ठी तुम दोनों अपने पास संभालकर रखो और जब मैं आऊं तो मुझे यह दो मुठ्ठी गेहूं वापस करना है।जो शिष्य मुझे अपने गेहूं सुरक्षित वापस कर देगा, मैं उसे ही इस गुरुकुल का गुरु नियुक्त करूंगा। दोनों शिष्यों ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य रखा और गुरु को विदा किया।

उन दोनों शिष्यों में से एक गुरु को भगवान मानता था। उसने तो गुरु के दिए हुए एक मुट्ठी गेहूं की पोटली बांध कर एक आलिए में सुरक्षित रख दिए और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरा शिष्य जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था, उसने उन एक मुट्ठी गेहूं को ले जाकर गुरुकुल के पीछे खेत में बो दिए।

कुछ महीनों बाद गुरु वापस आश्रम आए। उन्होंने अपने शिष्य जो उन्हें भगवान मानता था, उससे अपने एक मुट्ठी गेहूं वापस मांगे। उस शिष्य ने गुरु को ले जाकर आलिए में रखी गेहूं की पोटली दिखाई, जिसकी वह रोज पूजा करता था। गुरु ने देखा कि उस पोटली के गेहूं सड़ चुके हैं और अब वे किसी काम के नहीं रहे।फिर गुरु ने दूसरे शिष्य को जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था, उससे अपने गेहूं दिखाने के लिए कहा। दूसरे शिष्य ने गुरु को आश्रम के पीछे ले जाकर कहा - गुरुदेव! यह लहलहाती जो फसल देख रहे हैं यही आपके एक मुट्ठी गेहूं हैं। आप मुझे क्षमा करें कि जो गेहूं आप दे गए थे, वही गेहूं मैं वापस दे नहीं सकता।गुरु उसके द्वारा बोए गए गेहूं की लहलहाती फसल देखकर प्रसन्न चित्त हो गए। उन्होंने कहा- जो शिष्य गुरु के ज्ञान को फैलाता है, बांटता है, वही गुरु का श्रेष्ठ उत्तराधिकारी होने का पात्र है। वास्तव में गुरु के प्रति सच्ची दक्षिणा यही है।

गुरु ने कहा - गुरुदक्षिणा का सामान्य अर्थ में पारितोषिक के रूप में लिया जाता है, किंतु गुरुदक्षिणा का वास्तविक अर्थ कहीं ज्यादा व्यापक है। महज पारितोषिक नहीं। गुरुदक्षिणा का अर्थ है कि गुरु से प्राप्त की गई शिक्षा एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार व उसका सही उपयोग कर जनकल्याण में लगाएं। गुरु ने अपने दूसरे शिष्य से प्रभावित होकर उसे आश्रम का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया।

इस कहानी का तात्पर्य यह ‍है कि जैसे सूर्य बिना कहे सबको प्राण ऊर्जा देता है, मेघ जल बरसाता है, हवा भी बिना किसी भेदभाव व लालच के ठंडक पहुंचा कर सभी को जीवित रखती है और फूल भी अपनी महक में कोई कसर नहीं रखता, वैसे ही गुरुजन भी स्वयं ही शिष्यों की भलाई में लगे रहते हैं।

 

Friday, November 17, 2017

शिष्य का गुरु

एक समय की बात है । अकबर ने तानसेन से कहा था कि तेरा वीणावादन देखकर कभी—कभी यह मेरे मन में खयाल उठता है कि कभी संसार में किसी आदमी ने तुझसे भी बेहतर बजाया होगा या कभी कोई बजाएगा? मैं तो कल्पना भी नहीं कर पाता कि इससे श्रेष्ठतर कुछ हो सकता है। तानसेन ने कहा, क्षमा करें, शायद आपको पता नहीं कि मेरे गुरु अभी जिन्दा हैं। और एक बार अगर आप उनकी वीणा सुन लें तो कहां वे और कहां मैं !!!

बड़ी जिज्ञासा जगी अकबर को। अकबर ने कहा तो फिर उन्हें बुलाओ! तानसेन ने कहा " इसीलिए कभी मैंने उनकी बात नही छेड़ी। आप मेरी सदा प्रशंसा करते थे, मैं चुपचाप पी लेता था, जैसे जहर का घूंट कोई पीता है, क्योंकि मेरे गुरु अभी जिन्दा हैं, उनके सामने मेरी क्या प्रशंसा! यह यूं ही है जैसे कोई सूरज को दीपक दिखाये। मगर मैं चुपचाप रह जाता था, कुछ कहता न था, आज न रोक सका अपने को, बात निकल गयी। लेकिन नहीं कहता था इसीलिए कि आप तत्‍क्षण कहेंगे, ‘उन्हें बुलाओ’। और तब मैं मुश्किल में पढूंगा, क्योंकि वे यूं आते नहीं। उनकी मौज हो तो जंगल में बजाते हैं, जहां कोई सुननेवाला नहीं। "तो अकबर ने कहा, फिर क्या करना पड़े, कैसे सुनना पड़े? तो तानसेन ने कहा, "एक ही उपाय है कि यह मैं जानता हूं कि रात तीन बजे वे उठते हैं, यमुना के तट पर आगरा में रहते हैं—हरिदास उनका नाम था—हम रात चलकर छुप जाएं—दो बजे रात चलना होगा; क्योंकि कभी तीन बजे बजाए, चार बजे —बजाए, पांच बजे बजाए; मगर एक बार जरूर सुबह—सुबह स्नान के बाद वे वीणा बजाते हैं— तो हमें चोरी से ही सुनना होगा, बाहर झोपड़े के छिपे रहकर सुनना होगा। " शायद ही दुनिया के इतिहास में किसी सम्राट ने, अकबर जैसे बड़े सम्राट ने चोरी से किसी की वीणा सुनी हो !!.लेकिन अकबर गया।

दोनों छिपे रहे एक झाड़ की ओट में, पास ही झोपड़े के पीछे। कोई तीन बजे स्नान करके हरिदास यमुना सै आये और उन्होंने अपनी वीणा उठायी और बजायी। कोई घंटा कब बीत गया—यूं जैसे पल बीत जाए! वीणा तो बंद हो गयी, लेकिन जो राग भीतर अकबर के जम गया था वह जमा ही रहा। आधा घंटे बाद तानसेन ने उन्हें हिलाया और कहा कि अब सुबह होने के करीब है, हम चलें! अब कब तक बैठे रहेंगे। अब तो वीणा बंद भी हो चुकी। अकबर ने कहा, बाहर की तो वीणा बंद हो गयी मगर भीतर की वीणा बजी ही चली जाती है। तुम्हें मैंने बहुत बार सुना, तुम जब बंद करते हो तभी बंद हो जाती है। यह पहला मौका है कि जैसे मेरे भीतर के तार छिड़ गये हैं।। और आज सच में ही मैं तुमसे कहता हूं कि तुम ठीक ही कहते थे कि कहा तुम और कहां तुम्हारे गुरु!!

अकबर की आंखों से आंसू झरे जा रहे हैं। उसने कहा, मैंने बहुत संगीत सुना, इतना भेद क्यों है? और तेरे संगीत में और तेरे गुरु के संगीत में इतना भेद क्यों है? जमीन— आसमान का फर्क है। तानसेन ने कहा, "कुछ बात कठिन नहीं है। मैं बजाता हूं कुछ पाने के लिए; और वे बजाते हैं क्योंकि उन्होंने कुछ पा लिया है। उनका बजाना किसी उपलब्धि की, किसी अनुभूति की अभिव्यक्ति है। मेरा बजाना तकनीकी है। मैं बजाना जानता हूं मैं बजाने का पूरा गणित जानता हूं मगर गणित!!! बजाने का अध्यात्म मेरे पास नहीं! और मैं जब बजाता होता हूं तब भी इस आशा में कि आज क्या आप देंगे? हीरे का हार भेंट करेंगे, कि मोतियों की माला, कि मेरी झोली सोने से भर देंगे, कि अशार्फेयों से? जब बजाता हूं तब पूरी नजर भविष्य पर अटकी रहती है, फल पर लगी रहती है। वे बजा रहे हैं, न कोई फल है, न कोई भविष्य, वर्तमान का क्षण ही सब कुछ है।  उनका बजाना आनंद है, साधन नहीं। वे मस्ती में हैं।