Monday, October 22, 2018
प्रेम की परीक्षा
Monday, January 29, 2018
श्रद्धा
एक बार गुरुजी सत्संग करके आ रहे थे।रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ। उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा-“महापुरुषों, हमे चाय पीनी है।” ड्राइवर गाड़ी 5 स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरुजी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।” फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरूजी ने वह भी मना कर दिया।काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई। गुरूजी ने कहा- “यहाँ रोक दो। यहाँ पर पीते हैं चाय।” ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरुजी ऐसी जगह चाय पीएंगे। खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।”
जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरूजी का सरूप फोटो लगा हुआ था।गुरूजी का सरूप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”तो दुकानदार ने कहा-
“मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया।पर मुझे यकीन है कि गुरूजी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”तो ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”तो दुकानदार ने बोला-“अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।” तो ड्राइवर ने कहा-“चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”*
दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया।
जब वहां उसने गुरुजी के देखा तो हैरान हो गया।
आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा-“तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
Friday, January 12, 2018
ईश्वर की डायरी
Sunday, December 10, 2017
अनमोल भक्ति
उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।
फकीर ने कहा : उसी धन का नाम भक्ति है।
Saturday, December 2, 2017
ईश्वर की इच्छा
"तब!" राबिया ने कहा - "तुम मुझसे कैसे कहते हो कि मैं उसकी इच्छा के खिलाफ बीमारी से छुटकारा पाने के लिए उससे प्रार्थना करूं? उसे जिस दिन ठीक करना होगा, अपने आप कर देगा|"
Friday, December 1, 2017
भक्ति प्रेम
Monday, November 20, 2017
चढ़ावा
उसने कहा, मुझसे मत पूछो; उससे ही पूछो। जब सब दे दिया तो कचरा क्या मैं बचाऊं ? मैं ऐसी नासमझ नहीं।
उस फकीर ने उस रात एक स्वप्न देखा कि वह स्वर्ग ले जाया गया है। परमात्मा के सामने खड़ा है। स्वर्ण—सिंहासन पर परमात्मा विराजमान है। सुबह हो रही है, सूरज ऊग रहा है, पक्षी गीत गाने लगे—सपना देख रहा है—और तभी अचानक एक टोकरी भर कचरा आ कर परमात्मा के सिर पर पड़ा और उसने कहा कि यह बाई भी एक दिन नहीं चूकती! फकीर ने कहा कि मैं जानता हूं इस बाई को। कल ही तो मैंने इसे देखा था और कल ही मैंने उससे कहा था कि यह तू क्या करती है? लेकिन घंटे भर वहां रहा फकीर, बहुत—से लोगों को जानता था जो फूल चढ़ाते हैं, मिष्ठान्न चढ़ाते हैं, वे तो कोई नहीं आए। उसने पूछा परमात्मा को कि फूल चढ़ाने वाले लोग भी हैं...सुबह ही से तोड़ते हैं, पड़ोसियों के वृक्षों में से तोड़ते हैं। अपने वृक्षों के फूल कौन चढ़ाता है! आसपास से फूल तोड़कर चढ़ाते हैं......उनके फूल तो कोई गिरते नहीं दिखते ?
परमात्मा ने उस फकीर को कहा, जो आधा—आधा चढ़ाता है, उसका पहुंचता नहीं। इस स्त्री ने सब कुछ चढ़ा दिया है, कुछ नहीं बचाती, जो है सब चढ़ा दिया है। समग्र जो चढ़ाता है, उसका ही पहुंचता है।
घबड़ाहट में फकीर की नींद खुल गई। पसीने—पसीने हो रहा था, छाती धड़क रही थी। क्योंकि अब तक की मेहनत, उसे याद आया कि व्यर्थ गई। मैं भी तो छांट—छांट कर चढ़ाता रहा।
Saturday, November 18, 2017
गीता का सच्चा पाठ
Thursday, November 16, 2017
हिसाब किताब
लेकिन उसके पास रोजाना ही एक बच्चा आता। बच्चे के पास कभी पैसे होते, कभी नहीं। पर न तो ग्वालिन उससे कोई सवाल पूछती, न पैसे गिनती। उसका बर्तन दूध से भर देती। यह देख साधु सोच में पड़ जाते। वह कड़क ग्वालिन उस बच्चे के साथ क्यों इतनी कोमल थी, इस जिज्ञासा ने उन्हें परेशान कर डाला। इतना कि माला फेरने में भी उनका ध्यान न लगता।
काफी दिनों तक सोचने के बाद आखिरकार एक दिन उनसे रहा न गया। वह उस ग्वालिन के पास गए और बोले, ‘बहन, उस बच्चे में ऐसा क्या है कि आप रोजाना ही उसका बर्तन दूध से भर देती हैं, जबकि दूसरों के साथ आप इतना कड़ा रूख रखती हैं।’ ग्वालिन साधु को देख मुस्कराई, बोली, ‘आप इतना भी नहीं समझे महाराज/ प्रेम से भारी भला क्या वस्तु है! क्या आपने बच्चे की आंखों में कभी झांक कर देखा है/ उनमें उसका सच्चा प्रेम झलकता है, फिर उससे भला कैसा सौदा।’
यह सुन साधु हक्का-बक्का रह गए। उनके हाथ से माला गिर गई। वर्षों से जिस ज्ञान की उन्हें तलाश थी, अचानक ही उस सीधी-सादी ग्वालिन ने उन्हें बिना मांगे दे दिया। पूजा-पाठ, माला फेरना, जप सभी की व्यर्थता सामने खुल गई। लगा जैसे यह सब ईश्वर से सौदा करने जैसा था। वह जान गए कि सच्ची पूजा तो सच्चे प्रेम में ही छुपी है। सच्ची प्रार्थना वही है, जो सच्चे प्रेम के साथ की जाए।
Wednesday, November 15, 2017
प्रेम की परिभाषा
कहते हैं, उस सूफी के जीवन में क्रांति हो गई इस बात से।उसने कहा, अब नमाज तभी पड़ेंगे जब प्रेम होगा, अन्यथा क्या सार है?व्रत से नहीं—बोध से। व्रत से नहीं—प्रेम से। व्रत से नहीं, नियम से नहीं, किसी बाहरी अनुशासन से नहीं—अंतरभाव से!