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Monday, October 22, 2018

प्रेम की परीक्षा

 चकवा पक्षी के विषय में प्रसिद्धि है कि रात्रि के समय चकई से उसका वियोग हो जाता है और दोनों एक दूसरे के लिए विलाप करते रहते हैं। सारस के सम्बन्ध में कहा जाता है यदि उसके जोड़े में से एक की मृत्यु हो जाय, तो दूसरा भी अपने प्राणों का परित्याग कर देता है। एक दिन सारस और चकवा कहीं मिल गये। दोनों में विवाद छिड़ गया कि किसकी स्थिति सही है। सारस ने चकवे को फटकारते हुए कहा, "यह रात भर क्या चिल्लाया करते हो ?" चकवा बोला, "तो क्या अपनी प्रियतमा के वियोग में भी न चिल्लाएँ ?" सारस तिरस्कार करता हुआ बोला, "यह तो तुम प्रेम का विज्ञापन करते हो। यदि सचमुच तुम्हारी प्रीति होती, तो वियोग में तुम्हारी मृत्यु हो जाती। यह चीखना-चिल्लाना बेकार है। जब तुम वियोग में भी जीवित बने रहते हो, तब तुम्हारी प्रीति सार्थक नहीं है !" उत्तर में चकवे ने कहा, "तुमने केवल मिलन को ही जाना है, वियोग में कभी प्रेम की परीक्षा लेने का तुमने अवसर ही नहीं दिया है, इसलिए तुम क्या जानो की वियोग की स्थिति में किस पीड़ा का अनुभव होता है ? तुम तो केवल मिलन-सुख के प्रेमी हो, वियोग की स्थिति में प्राणों का परित्याग करके तुम कायरता का ही परिचय देते हो, तुम सच्चे प्रेमी नहीं हो !" तो भक्त का प्रेम कैसा होना चाहिए ? -- सारस जैसा या चकवा-जैसा ? श्री हरिवंश स्वामीजी एक बड़ी सुंदर बात कहते हैं --भक्ति का रस न तो मिलन-रस है और न विरह-रस, वह तो मिलन-बिरहा रस है, जहाँ संयोग में भी निरन्तर वियोग की अनुभूति बनी रहती है और वियोग में निरन्तर संयोग की। 

Monday, January 29, 2018

श्रद्धा

एक बार गुरुजी सत्संग करके आ रहे थे।रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ। उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा-“महापुरुषों, हमे चाय पीनी है।” ड्राइवर गाड़ी 5 स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरुजी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।” फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरूजी ने वह भी मना कर दिया।काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई। गुरूजी ने कहा- “यहाँ रोक दो। यहाँ पर पीते हैं चाय।” ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरुजी ऐसी जगह चाय पीएंगे। खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।”

जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरूजी का सरूप फोटो लगा हुआ था।गुरूजी का सरूप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”तो दुकानदार ने कहा-
“मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया।पर मुझे यकीन है कि गुरूजी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”तो ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”तो दुकानदार ने बोला-“अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।” तो ड्राइवर ने कहा-“चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”*

दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया।

जब वहां उसने गुरुजी के देखा तो हैरान हो गया।

आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा-“तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

Friday, January 12, 2018

ईश्वर की डायरी



एक समय की बात है. एक संत हुआ करते थे । उनकी इबादत या भक्ति इस कदर थीं कि वो अपनी धुन में इतने मस्त हो जाते थे की उनको कुछ होश नहीं रहता था । उनकी अदा और चाल इतनी मस्तानी हो जाती थीं । वो जहाँ जाते , देखने वालों की भीड़ लग जाती थी। और उनके दर्शन के लिए लोग जगह -जगह पहुँच जाते थे । उनके चेहरे पर नूर साफ झलकता था ।
वो संत रोज सुबह चार बजे उठकर ईश्वर का नाम लेते हुए घूमने निकल जाते थे। एक दिन वो रोज की तरह अपने मस्ति में मस्त होकर झूमते हुए जा रहे थे।
रास्ते में उनकी नज़र एक फ़रिश्ते पर पड़ी और उस फ़रिश्ते के हाथ में एक डायरी थीं । संत ने फ़रिश्ते को रोककर पूछा आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और ये डायरी में क्या है ? फ़रिश्ते ने जवाब दिया कि इसमें उन लोगों के नाम है जो खुदा को याद करते है ।
यह सुनकर संत की इच्छा हुई की उसमें उनका नाम है कि नहीं, उन्होंने पुछ ही लिया की, क्या मेरा नाम है इस डायरी में ? फ़रिश्ते ने कहा आप ही देख लो और डायरी संत को दे दी । संत ने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम कही नहीं था । इस पर संत थोड़ा मुस्कराये और फिर वह अपनी मस्तानी अदा में रब को याद करते हुए चले गये ।
दूसरे दिन फिर वही फ़रिश्ते वापस दिखाई दिये पर इस बार संत ने ध्यान नहीं दिया और अपनी मस्तानी चाल में चल दिये।इतने में फ़रिश्ते ने कहा आज नहीं देखोगे डायरी । तो संत मुस्कुरा दिए और कहा, दिखा दो और जैसे ही डायरी खोलकर देखा तो, सबसे ऊपर उन्ही संत का नाम था
इस पर संत हँस कर बोले क्या खुदा के यहाँ पर भी दो-दो डायरी हैं क्या ? कल तो था नहीं और आज सबसे ऊपर है ।
इस पर फ़रिश्ते ने कहा की आप ने जो कल डायरी देखी थी, वो उनकी थी जो लोग ईश्वर से प्यार करते हैं । आज ये डायरी में उन लोगों के नाम है, जिनसे ईश्वर खुद प्यार करता है ।
बस इतना सुनना था कि वो संत दहाड़ मारकर रोने लगे, और कितने घंटों तक वही सर झुकाये पड़े रहे, और रोते हुए ये कहते रहे ए ईश्वर यदि में कल तुझ पर जरा सा भी ऐतराज कर लेता तो मेरा नाम कही नहीं होता । पर मेरे जरा से सबर पर तु मुझ अभागे को इतना बड़ा ईनाम देगा । 

Sunday, December 10, 2017

अनमोल भक्ति

एक समय की बात है. एक फकीर जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था, रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था। एक दिन उससे कहा कि सुन भाई, दिन— भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा। गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है! जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती।  फिर भी उसने सोचा की  एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है। वो  गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी।  मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है।दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती। एक दिन फकीर ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है? उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकडिया—वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो—चार छ: महीने के लिए हो गया। अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार—छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। फकीर ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता? उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?

उस फकीर ने कहा. हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।
फकीर ने कहा : उसी धन का नाम  भक्ति  है।

Saturday, December 2, 2017

ईश्वर की इच्छा

एक समय की बात है. संत राबिया एक दिन बहुत बीमार हो गईं| एक साधक उनसे मिलने आया| राबिया की हालत देखकर उसे बड़ा दुख हुआ, पर कहे तो क्या कहे|  राबिया उसके मन की बात ताड़ गईं| उन्होंने कहा - "तुम कुछ कहना चाहते हो, कहो|" उस साधक ने कहा - "आप इतनी बीमार हो| ईश्वर से प्रार्थना करो, वह आपकी बीमारी को दूर कर देंगे|" राबिया उसकी बात सुनकर हंस पड़ीं| बोलीं - "क्या तुम्हें पता नहीं कि बीमारी किसकी इच्छा से होती है? क्या मेरी बीमारी में प्रभु का हाथ नहीं है?" साधक बोला - "आप ठीक कहती हैं| बिना उसकी इच्छा के कुछ भी नहीं हो सकता|"

"तब!" राबिया ने कहा - "तुम मुझसे कैसे कहते हो कि मैं उसकी इच्छा के खिलाफ बीमारी से छुटकारा पाने के लिए उससे प्रार्थना करूं? उसे जिस दिन ठीक करना होगा, अपने आप कर देगा|"

Friday, December 1, 2017

भक्ति प्रेम

एक गोपी यमुना किनारे बैठी प्राणायाम कर रही थी। तभी वहां नारद जी वीणा बजाते हुए आये,नारद जी बड़े ध्यान से देखने लगे गोपी कर क्या रही है क्योकि व्रज में कोई ध्यान लगाये ये बात उन्हें हजम ही नहीं हो रही थी बहुत देर तक विचार करते रहने पर भी उन्हें समझ नहीं आया तो वे गोपी के और निकट गए और गोपी से बोले,"देवी! ये आप क्या कर रही है, बहुत देर तक विचार करने पर भी मुझे समझ नहीं आ रहा क्योंकि व्रज में कोई ध्यान लगाये,वो भी इस तरह प्राणायाम आदि नियमों सहित ऐसा तो व्रज में कभी सुना नहीं फिर ऐसा क्या हो गया कि आपको ध्यान लगाने की आवश्यकता पड़ गई?" गोपी बोली,"नारद जी!मै जब भी कोई काम करती हूं तो कर नहीं पाती हर समय वो नंद का छोरा आंखों में बसा रहता है,घर लीपती हूं तो गोवर में वही दिखता है लीपना तो वही छूट जाता है और कृष्ण के ध्यान में ही डूब जाती हूं,रोटी बनाती हूं तो जैसे ही आटा गूदती हूं, तो नरम-नरम आटा में कृष्ण के कोमल चरणों का आभास होता है, आटा तो वैसा ही रखा रह जाता है और में कृष्ण की याद में खो जाती हूं, कहां तक बताऊ नारद जी, जल भरने यमुना जी जाती हूं तो यमुना जी में,जल की गागर में, रास्ते में, हर कहीं नंदलाला ही दिखायी देते हैं। मै इतना परेशान हो गई हूं कि कृष्ण को ध्यान से निकालने के लिए ध्यान लगाने बैठी हूं।" हमें तो भगवान को याद करना पड़ता है,भगवान को याद करने के लिए ध्यान लगाना पड़ता है,और गोपी को ध्यान से निकलने के लिए ध्यान में बैठना पड़ता है। गोपी की हर क्रिया में कृष्ण है, गोपी ने अपने ह्रदय में केवल कृष्ण को बैठा रखा है  

Monday, November 20, 2017

चढ़ावा

एक समय की बात है. एक बुढ़िया जो कुछ उसके पास होता सभी परमात्मा पर चढ़ा देती। यहां तक कि सुबह वह जो घर का कचरा वगैरह फेंकती, वह भी घूरे पर जाकर कहती: तुझको ही समर्पित। लोगों ने जब यह सुना तो उन्होंने कहा, यह तो हद हो गई ! फूल चढ़ाओ, मिष्ठान चढ़ाओ...कचरा ? एक फकीर गुजर रहा था, उसने एक दिन सुना कि वह बुढ़िया गई घूरे पर, उसने जाकर सारा कचरा फेंका और कहा: हे प्रभु, तुझको ही समर्पित! उस फकीर ने कहा कि बाई, ठहर ! मैंने बड़े—बड़े संत देखे.......तू यह क्या कह रही है ?

उसने कहा, मुझसे मत पूछो; उससे ही पूछो। जब सब दे दिया तो कचरा क्या मैं बचाऊं ? मैं ऐसी नासमझ नहीं।
उस फकीर ने उस रात एक स्वप्न देखा कि वह स्वर्ग ले जाया गया है। परमात्मा के सामने खड़ा है। स्वर्ण—सिंहासन पर परमात्मा विराजमान है। सुबह हो रही है, सूरज ऊग रहा है, पक्षी गीत गाने लगे—सपना देख रहा है—और तभी अचानक एक टोकरी भर कचरा आ कर परमात्मा के सिर पर पड़ा और उसने कहा कि यह बाई भी एक दिन नहीं चूकती! फकीर ने कहा कि मैं जानता हूं इस बाई को। कल ही तो मैंने इसे देखा था और कल ही मैंने उससे कहा था कि यह तू क्या करती है? लेकिन घंटे भर वहां रहा फकीर, बहुत—से लोगों को जानता था जो फूल चढ़ाते हैं, मिष्ठान्न चढ़ाते हैं, वे तो कोई नहीं आए। उसने पूछा परमात्मा को कि फूल चढ़ाने वाले लोग भी हैं...सुबह ही से तोड़ते हैं, पड़ोसियों के वृक्षों में से तोड़ते हैं। अपने वृक्षों के फूल कौन चढ़ाता है! आसपास से फूल तोड़कर चढ़ाते हैं......उनके फूल तो कोई गिरते नहीं दिखते ?

परमात्मा ने उस फकीर को कहा, जो आधा—आधा चढ़ाता है, उसका पहुंचता नहीं। इस स्त्री ने सब कुछ चढ़ा दिया है, कुछ नहीं बचाती, जो है सब चढ़ा दिया है। समग्र जो चढ़ाता है, उसका ही पहुंचता है।
घबड़ाहट में फकीर की नींद खुल गई। पसीने—पसीने हो रहा था, छाती धड़क रही थी। क्योंकि अब तक की मेहनत, उसे याद आया कि व्यर्थ गई। मैं भी तो छांट—छांट कर चढ़ाता रहा।

Saturday, November 18, 2017

गीता का सच्चा पाठ

एक समय की बात है।चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण की यात्रा पर निकले थे | रास्ते में एक सरोवर के किनारे पर एक ब्राह्मण को गीता पाठ करते देखा | वह गीता पाठ में इतना तल्लीन था की उसे अपने शरीर की भी सुध नहीं थी | उसका हृदय गदगद हो रहा था और नेत्रों से आंसुओं की धारा बह रही थी| पाठ समाप्त होने पर चैतन्य ने पूछा, " तुम तो श्लोकों का अशुद्ध उच्चारण कर रहे थे, तुम्हे इनका अर्थ कहाँ मालूम होगा?" उसने उत्तर दिया, "भगवन! मैं कहाँ जानूं संस्कृत? मैं तो जब पढने बैठता हूँ तो ऐसा लगता है की कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर बड़ी भारी सेनायें सजी हुयी खड़ी हैं | जहां बीच में एक रथ पर भगवान् कृष्ण अर्जुन से कुछ कह रहे हैं | उन्हें देख कर रुलाई आ रही है |" चैतन्य महाप्रभु ने उसकी ऐसी निर्मल अत्यंत प्रेमपूर्ण भावना देख कहा," भैया ! तुम्ही ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है |" और उन्होंने उसे अपने गले लगा लिया...

Thursday, November 16, 2017

हिसाब किताब

एक समय की बात है. किसी गांव में एक कुटिया में एक साधु रहते थे। सीधा-सादा जीवन, ईश्‍वर का नाम लेने और माला फेरने में उनका पूरा दिन बीत जाता। उन्हें मोक्ष प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा थी। जितनी बार ईश्‍वर का ध्यान करते या जितनी बार वह अपनी माला फेरते, कॉपी में लिख लेते। एक दिन साधु की कुटिया के ठीक सामने एक ग्वालिन ने दुकान लगा ली। हर दिन सुबह के वक्‍त वह बाल्टी भरकर गाय का दूध लाती। ग्राहकों से दूध का मूल्‍य लेती और तौल कर बर्तन में दूध डाल देती। कोई ग्राहक यदि मोलभाव करने की कोशिश करता, तो वह उसे तीखे स्वर में तुरंत चलता कर देती। मजाल कि कोई उससे छटांक भर भी अधिक दूध ले पाता।

लेकिन उसके पास रोजाना ही एक बच्चा आता। बच्चे के पास कभी पैसे होते, कभी नहीं। पर न तो ग्वालिन उससे कोई सवाल पूछती, न पैसे गिनती। उसका बर्तन दूध से भर देती। यह देख साधु सोच में पड़ जाते। वह कड़क ग्वालिन उस बच्चे के साथ क्यों इतनी कोमल थी, इस जिज्ञासा ने उन्हें परेशान कर डाला। इतना कि माला फेरने में भी उनका ध्यान न लगता।

काफी दिनों तक सोचने के बाद आखिरकार एक दिन उनसे रहा न गया। वह उस ग्वालिन के पास गए और बोले, ‘बहन, उस बच्चे में ऐसा क्या है कि आप रोजाना ही उसका बर्तन दूध से भर देती हैं, जबकि दूसरों के साथ आप इतना कड़ा रूख रखती हैं।’ ग्वालिन साधु को देख मुस्कराई, बोली, ‘आप इतना भी नहीं समझे महाराज/ प्रेम से भारी भला क्या वस्तु है! क्या आपने बच्चे की आंखों में कभी झांक कर देखा है/ उनमें उसका सच्चा प्रेम झलकता है, फिर उससे भला कैसा सौदा।’

यह सुन साधु हक्का-बक्का रह गए। उनके हाथ से माला गिर गई। वर्षों से जिस ज्ञान की उन्हें तलाश थी, अचानक ही उस सीधी-सादी ग्वालिन ने उन्हें बिना मांगे दे दिया। पूजा-पाठ, माला फेरना, जप सभी की व्यर्थता सामने खुल गई। लगा जैसे यह सब ईश्‍वर से सौदा करने जैसा था। वह जान गए कि सच्ची पूजा तो सच्चे प्रेम में ही छुपी है। सच्ची प्रार्थना वही है, जो सच्चे प्रेम के साथ की जाए। 

Wednesday, November 15, 2017

प्रेम की परिभाषा

एक समय की बात है. एक सूफी नमाज पढ़ रहा था और एक औरत भागी हुई निकली, उसको धक्का देती हुई, उसके कपड़े पर पैर डालती हुई। वह बड़ा नाराज हुआ! बड़ा नाराज हुआ, लेकिन नमाज में था तो बोल नहीं सका। जल्दी उसने नमाज पूरी की कि और मन में सोचा इसका पीछा करें, कैसी बदतमीज औरत, इतना भी ध्यान नहीं!लेकिन जब वह नमाज करके उठा तो वह औरत वापिस आ रही थी। तो उसने उसे पकड़ा। उसने कहा कि " सुन बदतमीज औरत! तुझे इतना भी पता नहीं कि कोई ध्यान कर रहा है, नमाज कर रहा है, प्रार्थना कर रहा है?तो इस तरह, इस तरह सलूक करना चाहिए कि तू मुझे धक्का देती, मेरे कपड़े पर पैर रखती निकल गई? "उसने कहा. "क्षमा करें, मुझे याद भी नहीं। और मैंने देखा भी नहीं। मैं अपने प्रेमी से मिलने जाती थी।मुझे याद भी नहीं कि आप कहां बैठे थे, कहा नमाज पढ़ रहे थे, कौन नमाज पढ़ रहा था, कौन नहीं पढ़ रहा था, मुझे याद नहीं।  क्षमा करें! लेकिन एक बात आपसे पूछती हूं : मैं अपने प्रेमी से मिलने जाती थी।क्षणभंगुर प्रेमी, पर आप तो अपने परम परमात्मा प्रेमी से मिलने गए थे ? आपको, मेरे पैर आपके कपड़े पर पड़ गए, मेरा धक्का लगा, वह आपको पता भी चल गया।किसने मारा वह भी...आपको समझ में आ गया !आप क्या परमात्मा से मिल रहे थे? तब तो मेरी प्रार्थना आपसे बेहतर है। माना कि मैं किसी के शरीर के मोह में पड़ी हूं और यह मोह ठीक नहीं, लेकिन कम से कम है तो! और माना कि तुम परमात्मा के मोह में पड़े हो, मगर है कहां? "

कहते हैं, उस सूफी के जीवन में क्रांति हो गई इस बात से।उसने कहा, अब नमाज तभी पड़ेंगे जब प्रेम होगा, अन्यथा क्या सार है?व्रत से नहीं—बोध से। व्रत से नहीं—प्रेम से। व्रत से नहीं, नियम से नहीं, किसी बाहरी अनुशासन से नहीं—अंतरभाव से!